माँ को पारिभाषित करती कविता : हवेली

11/18/2017 2:53:32 PM
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माँ दुनिया में ऐसा शब्द जिसका कोई मोल नहीं एक एहसास है माँ. माँ के लिए यह कविता प्रकाशित कर रहे हैं यह कविता पाँच खण्डों में लिखी गयी एक लम्बी कविता है. जिसके बाकी के खंड पहले दिए जा चुके हैं. आज इसका अंतिम खंड दिया जा रहा है. जिसे लिखा है आईएएस Dr हरिओम ने.

माँ हवेली में क़ैद सन्नाटे जानते हैं 
कि तुम बोल नहीं सकती 
कि तुमने अरसे से सिर्फ़ और सिर्फ़ सुना है...
तुमसे बेहतर यह कौन जानेगा 
कि सुनना भी है संघर्ष का सोपान
तुम सुनना 
कि हवेली की ईंटों में 
खोटे इतिहास की खनक है 
कौन कहता है 
कि शब्द ही लड़ेंगे सारी लड़ाइयाँ 
श्रवण के बिना शब्दों को नहीं मिलती आकृति 
और दृष्टि के बिना शक्ति
तुम देखना 
कि अब पिता के चेहरे पर भी 
फूल रही हैं झाइयाँ 
उनकी आखों में आने लगा है अंधड़ 
कि हवेली की बुनियाद में पैदा हो गए हैं 
अहर्निश सक्रिय दीमक-दल 
फ़र्श पर पसर गई है धूल...
तुम देखना तो 
हवेली की पाषाण छाती पर 
उग आएँ हैं झाड़ 
और फ़ौलादी कंगूरे 
खाने लगे हैं जंग
माँ 
तुम बोलना न बोलना 
इतिहास के इन नवीन रूपान्तरणों को पहचानना 
देखना 
खिड़की-दरवाज़ों और दीवारों के पार 
डूबना 
हवेली के बाहर उमड़ते शोर में 
बिखरना 
बेआवाज़ खुश्बू-सा 
खिलना 
पतझर के दिनों में फिर एक बार 
सुर्ख टेसू-सा
माँ 
तुम ढलती उम्र के मुहाने पर बैठ 
चिलकती धूप में 
अपनी मुक्ति के उन्माद को सुखाना 
सोचना 
चिड़ियों और आसमानों के बारे में 
गाना 
ज़िन्दगी के विस्मृत गीत
माँ 
तुम उदास मौसमों में ख़िलाफ़ 
हवेली की छत पर 
हांफती गर्म हवाओं के साथ 
ख़ूबसूरत चिलबिल की तरह नाचना...

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