कविता : AAP के

3/12/2018 3:23:28 PM
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टीवी पर चल रहे हैं समाचार आप के,
सरकार आप की है ये अखबार आप के.

हर वक्त इनपे आँखें लगाये रखे हुजुर, 
पाला बदल न दें वफादार आप के.

जो लोग पाँव छूने में रखते हैं कुछ हिझक, 
वो लोह अस्ल में हैं गुनाहगार आप के.

इस भीड़ से किसी को नहीं कोई फायदा,
दो चार दुश्मनों के हैं, दो चार आप के. 

कीमत हर एक चीज़ की फ़ौरन लगाईये,
ये मंडियां हैं आप की, बाज़ार आप के.

कोई खिलाफ आपके मुंह खोलता नहीं,
सारे काबिले आप के, सरदार आप के. 

दरिया के पार जाना भी ‘जोगी’ हुआ मुहाल,
जासूस बैठे रहते हैं उस पार आप के.

डॉ. सुनील जोगी.

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