कविता : आ ही जाते हैं

11/18/2017 2:51:42 PM
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आ ही जाते हैं गिद्ध और कौंवे लाशों का मज़ा लेने को ये सब जानते हैं यहाँ,
कभी इनकी बातों पे मान बुरा ना अपने आपको सुलगाता जा तू बेवजह. 

कभी ना जिनको ख्याल आया किसी तनख्वाह ना किसी पेंशन का इस देश में,
चल पड़ते हैं लेके भीड़ वो भी यकायक खिचड़ी सी दाढ़ी वाले भेष में. 

भरा है प्यार बेशुमार कुछ इस क़दर जहाँपनाओं के मन में इस शहर में,
आतंकी को मारे जाने की शिकायत भी किये जाते हैं सुबह शाम दोपहर में.

किया ना जिसने हो इस्तेमाल दिमाग का ज़रा भी जीवन में जाने अनजाने, 
हो मुठभेड़ या सर्जिकल स्ट्राइक बिन सबूत स्पष्टीकरण वीडियो वो भी ना माने. 

फर्क है दीवाली ईद और क्रिसमस के पटाखों के धुएँ का भी इन दिलों में यहाँ, 
हैं मांगते जो वोट खुलेआम जाति धर्म के नाम पे बन बैठे हैं वो ठेकेदार वहाँ.  

                                                                                            - योगेंद्र खोखर . 

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