Hindi कविता : हवेली

11/4/2017 12:38:39 PM
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माँ दुनिया में ऐसा शब्द जिसका कोई मोल नहीं. एक एहसास है माँ. हम आज माँ के लिए यह कविता प्रकाशित कर रहे हैं.यह कविता पाँच खण्डों में लिखी गई एक लम्बी कविता है. पूरी कविता एक साथ देना मुमकिन नहीं है.आज इसका तीसरा खंड आपके सामने है. इसे लिखा है आईएएस Dr. हरिओम ने.

माँ 
अगर सचमुच ऐसा होता 
तुम न होती माँ 
होती हँसुए से पहाड़ काटती पहाड़ीन 
पढ़ी-लिखी टीचर-डॉक्टर 
चलाती होती कोई ब्यूटी पार्लर 
या होती बाज़ार के आईने में 
विज्ञापनों-सी आत्ममुग्ध मॉडल कोई 
तो भी निश्चय ही 
पिता होते तुम्हारे बिलकुल साथ 
अपनी छाया में तुम्हें समेटे 
तुम्हारे चारों ओर 
चक्रव्यूह-सी जटिल संरचना वाले कवच को 
तुम्हारी सुरक्षा के लिए 
आवश्यक बताते

माँ तुम पहले और अंत में 
अगर होती एक स्त्री भर 
तुम निश्चय ही जानती 
कि पिता की चाहतों में 
तुम्हारी सुरक्षा और सुखों की 
कितनी चिंता है

तुम हवेली से बाहर होती 
तो भी हवेली होती 
तुम्हारे भीतर

हवेली पिता के समाजशास्त्र की प्रयोगशाला है...

 

                                                      आगे भी जारी...

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