कविता: ज़िन्दगी बिना

3/5/2018 1:01:39 PM
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बिना ज़िन्दगी के जिए जा रहे हैं, 
लबों को हम अपने सीए जा रहे हैं.

ये सेल्युलर का युग, वाई-फाई के जलवे, 
वतन से मेरे डाकिये जा रहे हैं.

सड़क छाप भी आज नेता बना है, 
कहाँ से कहाँ हाशिये जा रहे हैं. 

नहीं पीने लायक है नदियों का पानी,
मगर जहर हम सब पिए जा रहे हैं. 

हमें रोशनी अब कहाँ से मिलेगी,
हवा चल गई है, दिए जा रहे हैं.

सभी पर मुसीबत पड़ी है कोई क्या,
हो पढ़ते हुए मर्सिए जा रहे हैं.

जमाना चुराने लगा इन को ‘जोगी’,
ग़ज़ल से तेरी काफिये जा रहे हैं.

                             डॉ. सुनील जोगी.  

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