कविता : आजकल नहीं मिलता

1/13/2018 11:41:02 AM
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जो सुकून था पहले, आजकल नहीं मिलता,
मुश्किलें ही मिलती हैं, कोई हल नहीं मिलता.

लोग कहते हैं जग में कोई शय नहीं बदली,
फिर भी इंसान बातों पर अब अटल नहीं मिलता. 

कैसी-कैसी तबदीली मौसमों पर आई है,
बारिशें नहीं होती और जल नहीं मिलता. 

खुद तबाह कर डाली आदमी ने यह दुनिया, 
सारे ताले सूखे हैं, अब कमल नहीं मिलता.

खुश नसीब लोगों की ज़िन्दगी में खुशियाँ हैं,
बद नसीब लोगों को एक पल भी मिलता. 

सीधे सादे लोगों की भीड़ क्या दिखावा है,
आदमीं ज़माने में क्यूँ सरल नहीं मिलता. 

दुःख तुम्हें मिले हैं क्यूँ, हम बतायेंगे ‘जोगी’,
नेकियों का दुनिया में कोई फल नहीं मिलता.

                                         डॉ. सुनील जोगी.
 

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