कविता : हवेली

11/14/2017 9:42:48 AM
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माँ दुनिया में ऐसा शब्द जिसका कोई मोल नहीं। एक एहसास है माँ. हम आज माँ के लिए यह कविता प्रकाशित कर रहे हैं। यह कविता पाँच खण्डों में लिखी गई एक लम्बी कविता है।पूरी कविता एक साथ देना मुमकिन नहीं है। इसका पहला हिस्सा आज दे रहे हैं। आने वाले संस्करणों में बाक़ी की कविता दी जाएगी। इसे लिखा है आईएएस Dr. हरिओम ने।

खंड- एक

गाँव के निशब्द गलियारों को रौंद 
हवेलियों के लोक में 
खो गए पिता...
आज तक भी न जान सके 
ताल-पोखर बाग़-बहेड़ कीट-पतंग जंतु-खग 
सब के सब
गाँव का रोना और पिता का खोना 
माँ तुम भी नहीं!
माँ तुम्हें याद हो शायद 
गाँव में कितने तो थे मोहल्ले 
और कहाँ-कहाँ जाते थे पिता अक्सर ख़ुश-ख़ुश 
तुम्हें याद हो शायद 
गाँव में कितने थे कुएँ 
और किन-किन में कूद मरी कोई औरत 
उम्र की किन-किन चौखटों को फलांद 
माँ तुम्हें कहाँ याद होगा कि तुम्हारी आँखों का पानी 
दखिन टोले के कूप-जल से भी अधिक खारा था 
और तब भी सूख जाया करता था 
जबकि टपकती रहती थीं तुम्हारे घर की छतें 
जबकि धार-धार बारिशों में 
उछरता रहता था वह ताल 
जिसके किनारे अक्सर जगमगा उठते थे 
घर और पिता की चाह में रखे तुम्हारे निर्जल व्रतों की लौ से
माँ तुम्हें भनक भी न रही होगी 
कि पिता एक दिन यकबयक 
ऐसे खो जाएँगे 
जैसे खो जाते हैं...
बच्चों से खिलौने
बड़ों के प्रेम-पत्र 
और बेईमानों से दावे-वादे
माँ तुम खटती रही उम्र भर 
आम-महुए, जामुन और करौंदे में 
घिसती रही आँगन-दालान कोठरी और कूड़े में 
टूटती रही पुराने बेडौल बर्तनों-सी 
तुम सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी अनजान 
और पिता के शब्दकोष की 
सबसे सुन्दर मूर्ख थी
माँ पिता तुम्हारी आँखों के ठीक सामने 
श्रम से सहेजे तुम्हारे घर को छोड़ 
खो गए हवेलियों के लोक में और ढूढ़ लाये 
सुर्ख रंगों से रंगी एक हवेली...
हवेली 
जिसकी बुनियादें दफ्न थीं सुदीर्घ क़ब्रों में
और धंसे पड़े थे कंगूरे आकाश की छाती में 
सिंह द्वार के पैरों में औंधी चौखट-रक्त सनी स्वेद-सीझी 
पड़ा हो ज्यों 
सामंत के सबल चरणों में 
फूटे मत्थे वाला मातहत कोई
माँ तुमने गौर किया हो शायद 
पिता खड़े होते हैं हवेली की चौखट पर ऐसे 
जैसे खड़े होते हैं तुम्हारी तुच्छ उम्मीदों पर अक्सर 
तनकर
माँ 
हवेली की हज़ारों बरस पुरानी प्राचीरों पर चुभे 
हज़ारों-हज़ार आघातों के बावजूद 
अक्षुण्ण है हवेली की हनक 
जैसे अक्षुण्ण है पिता के चेहरे की चमक 
तुम्हारी अमर-सुहाग अभिलाषा के उन्माद से
माँ 
पिता की हवेली 
तुम्हारी जीवन भर की तपस्या का प्रतिदान है
किसी भी पुरुष द्वारा एक स्त्री को दिया गया 
अबतक का सबसे सुन्दर उपहार
माँ 
तुम इस हवेली की 
चौखटों-मीनारों-गुम्बदों और प्राचीरों के बारे में सोचना
लोहे और लक्कड़ के मज़बूत पिंजर में 
कबूतर की तरह फड़फडाना
चमगादड़ की तरह हवेली के अँधेरे शयन-कक्षों में 
लटक मत जाना उलटी 
जहां रोशनी की पतली धार भी तुन्हें अँधा कर दे
माँ 
तुम आम-महुए-जामुन और करोंदे के बारे में सोचना 
तुम पेड़-पौधों चिड़ियों और पतंगों के बारे में 
खिलौनों और खिलाड़ियों के बारे में सोचना
माँ तुम अपने बारे में सोचना
माँ तुम अपने घर के लिए पिता की हवेली से लड़ना 
माँ तुम इस हवेली में मत रहना...

आगे भी जारी...

 

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