ममता के एहसास से भरी कविता : हवेली

11/14/2017 9:43:11 AM
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माँ दुनिया में ऐसा शब्द जिसका कोई मोल नहीं. एक एहसास है माँ. हम आज माँ के लिए यह कविता प्रकाशित कर रहे हैं. यह कविता पाँच खण्डों में लिखी गई एक लम्बी कविता है. पूरी कविता एक साथ देना मुमकिन नहीं है. आज इसका दूसरा खंड आपके सामने है. इसे लिखा है आईएएस Dr. हरिओम ने.

हवेली की बारादरी में सज्जित हैं, 
उन्नत ललाट उद्दीप्त मुखाकृतियाँ शिल्पकारों की. 
टंगे हैं मानचित्र, 
कक्षों वीथिकाओं और कंदराओं के. 
हवेली के ऊँचे गवाक्षों से, 
जब उतरती है धूप. 
खिल उठती है बारादरी, 
अभिजनता के बासी रूप-रस-गंध से मत्त. 
शिल्पकारों की श्रृंखला में खड़े, 
मंद-मंद मुस्कुराते हैं पिता. 
झंकृत हो उठती है, 
सभ्यता समाज और परिवार की ऐतिहासिकता.
माँ...तुम उदास मन से ही सही, 
पिता की मुस्कान के इतिहास पर सोचना.

 

                                          आगे भी जारी...

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