कविता: हे वीर

11/13/2017 7:09:55 PM
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अकारण ही दिल में आये लापरवाह आलस को भगा कर देख,
बेवजह सुलगते धधकते धुआँ उठाते अवसाद को बुझा कर देख,
मन में उठते गिरते ध्यान भटकाते शगुफों को दफना कर बढ़ ज़रा दो क़दम,
समझ आ जाये तुझे समय का महत्व खुद को भी कभी समझा कर देख,

अचरज़ से ना देख तू खुद में आये बदलाव को खुद को और आजमा कर देख,
भरोसा कर खुदी में पनपते विश्वास पर कभी ए दोस्त पसीना बहाकर देख,
जानता हूँ मज़ा आरामतलबी का भी अलग ही तो है ओ गुले गुलज़ार,
इस आराम पसंदी को वक़्त की कसौटी पर कस कभी खुद को झुंझला कर देख,

सभी के जीवन में समय आता है ये इसी समय को खुद की घड़ी में चलाकर देख,
घड़ी भली है ये इस घड़ी में चरागे हिम्मत में मेहनत का तेल यूँ जलाकर देख,
कोई नही इस जहां में ना सोचा हो मेहनत करूँ हर असफलता के बाद,
गिर कर सम्भलना भी बुरी बात नही दूसरों को गिरने से ही खुद को संभला कर देख.
                                                                                                  - योगेंद्र खोखर

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