कविता : कलमघसीट

11/27/2017 12:56:48 PM
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ओ कलमघसीट सुन मेरी बात,
लिखे जाता है कुछ भी क्यूँ इस क़दर.
खामोशी से भी रहा कर किसी एक पल,
क्यूँ अपनी मस्ती में जिये जाता है बेख़बर.

समझ पाता काश इन दिलों के जज्बात तू,
देख पाता परेशानी तो कहीं दिलों के ठाठ तू.
नहीं आसान है ये जिंदगी का अंजान सफ़र,
बस तुझे ही समस्या नहीं कोई आती नज़र.

यूँ खुशमिजाज़ी के जलवे बिखेर ना खुश हो,
क्या पता तेरे कारण कोई मासूम नाखुश हो.
रासायनिक क्रिया सबके दिलों की अलग है,
तेरे देसी हृदय में मालूम है नहीं आई ये समझ है.

तकनीकी खराबी है आमूल चूल परिवर्तन कर ले,
थोड़ा तनाव में दिख ज़रा झुक समर्पण कर ले.
अनुसंधान का विषय होगा ये अल्हड़पन भी कभी,
बेफिक्री को कर बंद ताले में तू गंभीर आवरण कर ले.

जीवन सरल निश्छल दर्शन ही नहीं व्यापार भी है, 
मुस्कुराहटों के पीछे दर्द से कहीं सरोकार भी है.
समझ कर इसी बात को कुछ इस तरह ले चल आगे,
लगे किसी मासूम को भी कि तेरा कहीं पैरोकार भी है.

                                                         - योगेंद्र खोखर

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